उत्तर आधुनिकतावाद (Postmodernism)

 उत्तर आधुनिकतावाद (Postmodernism) एक सांस्कृतिक, बौद्धिक और साहित्यिक आंदोलन है जो 20वीं शताबदी के मध्य में अस्तित्व में आया। यह आधुनिकतावाद (Modernism) के विचारों और धाराओं के खिलाफ उत्पन्न हुआ था। उत्तर आधुनिकतावाद ने परंपरागत विचारधाराओं, संरचनाओं और धारा की आलोचना की और नये दृष्टिकोण को प्रोत्साहित किया।

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उत्तर आधुनिकतावाद

हिन्दी में पोस्टमार्डनिज्म के स्थान पर उत्तर आधुनिकता शब्द का इस्तेमाल किया जाता है। आधुनिकता का अगला चरण उत्तर आधुनिकता है। आधुनिकता का विकास यूरोप में औद्योगीकरण, उपनिवेशवाद और बाजार व्यवस्था की प्रतिक्रिया के स्वरूप हुआ। पिछली तीन शताब्दियों से जो आधुनिकता का विकास हुआ, उत्तर आधुनिकता उसी का चरम रूप है। उत्तर आधुनिकता में साहित्य, संस्कृत, मनोविज्ञान, दर्शन को तर्कवादी दृष्टिकोण से समझा जा सकता है। आधुनिकता का चरमोत्कर्ष तकनीक, प्रौद्योगिकी, सूचना विस्फोट इलेक्ट्रॉनिक मीडिया आदि के विकास से परिलक्षित होता है।

उत्तर आधुनिकतावाद के जनक

उत्तर आधुनिकतावाद के जनक के रूप में कुछ प्रमुख विचारकों का नाम लिया जाता है, जिनमें से सबसे महत्वपूर्ण हैं -

1. फ्रेडरिक नीत्शे (Friedrich Nietzsche)

2. मार्शल मैक्लुहान (Marshall McLuhan)

3. जांफ्रांस्वा लियोतार (Jean-François Lyotard)

3. मिशेल फूको (Michel Foucault)

उत्तर आधुनिकता के सम्बन्ध में विद्वानों के विचार

  • उत्तर आधुनिकता पूँजीवादी विकास की नई स्थिति को दर्शाती है।
  • उत्तर आधुनिकता वाद में समीक्षा को स्थूल अर्थ की जगह उसकी व्यापकता व अनेक छायाओं को रेखांकित किया जाता है।

उत्तर आधुनिकता सम्पूर्णता का खण्डन करती है। वह कुरान, रामायण, महाभारत जैसे ग्रन्थों का खण्डन करती है, वह मूल्य हीनता की पक्षधर है। इसका केन्द्र सीमित चीज़ों पर होता है। उत्तर आधुनिकता की दृष्टि में कुछ भी सम्पूर्ण नहीं है। उत्तर आधुनिकता को लेकर एक निश्चित दृष्टि अभी तक स्थापित नहीं हो पाई है। विभिन्न आलोचकों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कुछ विद्वान् मानते हैं उत्तर आधुनिकता केवल साहित्य, कला और संस्कृति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सम्बन्ध सम्पूर्ण जीवन से है। यह वर्तमान के साथ-साथ भविष्य से भी सम्बन्ध रखती है।

उत्तर आधुनिकता को फैशन समझकर नकारा नहीं जा सकता, क्योंकि विचारधाराएँ किसी के कहने से नहीं बनती है। विचारधाराएँ भौतिक जगत् को वास्तविक परिस्थितियों में किसी की जरूरतों के लिए जन्म लेती हैं। उत्तर आधुनिकता आज के पूँजीवाद की एक वैचारिक तथा सांस्कृतिक अभिव्यक्ति है, जिसको जाने बिना पूँजीवाद को समझना आसान नहीं है। उत्तर आधुनिकता बाहरी विचारधारा है, किन्तु वर्तमान समय में भारत ने इसे अपना लिया है और इसके उदाहरण साहित्य क्षेत्र में उदय प्रकाश की कहानी वॉरेन हेस्टिंग का 'साण्ड' और मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास 'कुरु कुरु स्वाहा' में देखने को मिले हैं।

आधुनिकता का यही चरम उत्तर आधुनिकता है। आधुनिकता का भावबोध हमे पुराने मूल्यों का त्याग करके नए मूल्यों को ग्रहण करने की प्रेरणा देता है। हिन्दी के कथा साहित्य में भी आधुनिकता का समावेश हुआ है। समकालीन साहित्य में टूटन, घुटन, पीढ़ी अन्तराल, मृत्युबोध आदि अनेक रूपों में आधुनिकता दिखाई देती है। उत्तर आधुनिक समाज मीडिया समाज है। बोड्रिलाड जाक दरिदा उत्तर आधुनिक समाज की व्याख्या विखण्डनवाद से करते हैं। बोड्रिलाड कहते हैं कि "उत्तर आधुनिक समाज मौत के कगार पर खड़ा है।"

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