हिन्दी साहित्य में साठ के दशक के नए कहानीकारों में फणीश्वरनाथ रेण अपना विशिष्ट स्थान है। रेण की कहानियों का कथा विन्यास एकदम निजी उनका कथा क्षेत्र मुख्य रूप से स्वातन्त्र्योत्तर भारत का ग्रामीण क्षेत्र है। कथा साहित्य का उद्देश्य ग्रामीण जीवन की विषमता के साथ-साथ यहां जीवन में व्याप्त सरसता, सहजता और मानवीय संवेदनाओं को उभारना रहा जिसमे वे पूर्णतः सफल हुए।
फणीश्वरनाथ रेणु का जीवन परिचय
लेखक का नाम :- फणीश्वरनाथ रेणु (Phanishwar Nath Renu)
जन्म :- 4 मार्च, 1921 (पूर्णिया ज़िला, बिहार)
मृत्यु :- 11 अप्रैल, 1977
पिता :- शिलानाथ
विषय :- कहानी, उपन्यास, रिपोर्ताज, संस्मरण, रेखाचित्र
प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ :-
- उपन्यास -
- मैला आंचल
- परती परिकथा
- जूलूस
- दीर्घतपा
- कितने चौराहे
- पलटू बाबू रोड
- रिपोर्ताज -
- ऋणजल-धनजल
- नेपाली क्रांतिकथा
- वनतुलसी की गंध
- श्रुत अश्रुत पूर्वे
- प्रसिद्ध कहानियाँ -
- मारे गये गुलफाम (तीसरी कसम)
- एक आदिम रात्रि की महक
- लाल पान की बेगम
- पंचलाइट
- तबे एकला चलो रे
- ठेस
- संवदिया
सम्मान :-
- मैला आंचल उपन्यास के लिये रेणु जी को पद्मश्री से सम्मानित किया गया।
महत्वपूर्ण बिंदु :-
- 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्होंने सक्रिय रूप से योगदान दिया।
- रेणु जी को आजादी के बाद का प्रेमचन्द की संज्ञा दी जाती है।
तीसरी कसम कहानी का विषय
- किसान जीवन और संघर्ष का चित्रण किया गया है।
- मनोविज्ञान और प्रेम पर आधारित कहानी।
- सामाजिक जड़ता और रूढ़िवादिता का वर्णन।
- निर्णय और नैतिकता का समावेश।
- इस कहानी में मनुष्य की असमर्थता और विवशता का वखान किया गया है।
तीसरी कसम कहानी के प्रमुख पात्र
हिरामन - इस कहानी का नायक है, जो सीधा-सादा और भोला ग्रामीण युवक है। वह एक गाड़ीवान (बैलगाड़ी चलाने वाला) है।
हीराबाई - नौटंकी में काम (अभिनय) करने वाली एक रूपवती स्त्री है, जिसे सामान्य भाषा में बाई कहा जाता है।
लालमोहर/धुन्नीराम/पलटदास - ये हिरामन के गाँव के गाड़ीवान हैं, जो हिरामन के प्रतिस्पर्दी हैं। ये कहानी के विकास में अपनी भूमिका निभाते हैं।
'तीसरी कसम' कहानी की समीक्षा
'तीसरी कसम' फणीश्वरनाथ 'रेणु' की बहुचर्चित कहानी है। इस कहानी में मूल संवेदना प्रेम है। हिरामन तथा हीराबाई के मध्य बैलगाड़ी के कुछ घण्टों के सफर में एक आत्मीय सम्बन्ध स्थापित हो गया था। यह आत्मीय सम्बन्ध प्रेम का था, लेकिन कहानी में कहीं भी इस प्रेम की स्वीकारोक्ति नहीं मिलती है।
इस कहानी में हिरामन और हीराबाई का प्रेम कथित नहीं, अपितु व्यंजित हुआ है। कहानीकार ने स्थान-स्थान पर इसे बड़ी स्पष्टता से संकेतित किया है। हिरामन की गाड़ी में हीराबाई के सवारी के रूप में चढने के बाद हिरामन को पीठ में अजीब सी गुदगुदी का अहसास होना तथा अलग प्रकार की अनुभूति होना इसी बात का द्योतक है।
हीराबाई की बच्चों की-सी मीठी बोली सुनने और उसका परी जैसा सुन्दर रूप देखने पर हिरामन के हृदय में आकर्षण उत्पन्न होने लगता है। हिरामन से बात करने के बाद हीराबाई को सहज, सरल तथा निश्छल हिरामन भा गया। सहज आकर्षण क्रमशः प्रेम की भावना में परिवर्तित होता जाता है, जिसमें परिहास अपनी भूमिका निभाता है।
महुआ घटवारिन की लोक-कथा कहानी में अर्थ के नए आयाम भरती है, जो कहानी की अर्थ व्याप्ति की दृष्टि से अत्यन्त सार्थक है। कहानी के अन्त में हिरामन से विदा लेते समय हीराबाई का कथन “महुआ घटवारिन को सौदागर ने खरीद जो लिया है गुरुजी" एक प्रकार से उसके प्रेम और साथ ही उसकी लाचारी को स्पष्ट करता है। इस कहानी की विशेषता घटनाओं या बाह्य स्थितियों के संयोजन में न होकर मानसिक स्थितियों के संयोजन तथा उनके विस्तार अंकन करने में है। भावनाओं की गहराती जटिलता को प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करने के लिए कहानी का कथानक लम्बा हो गया है। मुख्यतः रचनाकार की मनोवृत्ति हिरामन के चरित्र व विचारों को उभारने में अधिक रमी है। पूरी कहानी में हिरामन के भाव व हरकतें ही अधिक मुखरित होकर चित्रित हुए हैं। हीराबाई के मनोभाव के दर्शन सांकेतिक रूप से कहीं-कहीं चित्रित हुए हैं।
इस कहानी में प्रेम की भाव प्रवणता पूरी तरलता (चंचलता) के साथ व्यंजित हुई है। साथ ही इसकी विशेषता यह है कि यह निश्छल प्रेम कथा कहीं भी मर्यादा का अतिक्रमण नहीं करती दिखाई देती है। इसमें प्रेम को लेकर न तो बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, न ही लम्बी-चौड़ी कसमें खाई जाती हैं। वास्तव में, पूरी कहानी में कहीं भी प्रेम का सीधा-साधा प्रस्ताव तक नहीं है। यहाँ प्रेम व्यक्त करने की नहीं, बल्कि महसूस करने वाली खुशबू के रूप में अभिव्यक्त हुआ है। अपनी इसी विशेषता के कारण 'तीसरी कसम' कहानी एक कालजयी रचना बन गई है।
कहानी के शिल्प की विशेषता इसकी किस्सागोई की शैली है। वाक्य संरचना भी उसी के अनुरूप है। ऐसा लगता है जैसे हम कहानी पढ़ नहीं, बल्कि सुन रहे हैं। एक-एक पात्र, परिवेश तथा दृश्य हमारी आँखों के सामने से गुजरते हुए प्रतीत होते हैं। यह कहानी वर्तमान में घटित होती चलती है। इस कहानी में पूर्वदीप्ति पद्धति (फ्लैश बैक) का सहारा भी लिया गया है। जब हिरामन अपनी पहली दो कसमों के प्रसंग को याद करता है।
पहली कसम बाँस ढोने पर हुई दुर्घटना के कारण पिटाई होने पर खाई कि अब कभी बाँस नहीं ढोएगा।
दूसरी कसम चोरबाज़ारी का माल ढोते समय उसकी तथा उसके बैलों की जान आफत में फँसने के समय खाई थी कि कभी चोरी का माल नहीं ढोएगा।
तीसरी कसम कम्पनी की महिला को अपनी गाड़ी में न बिठाने के सन्दर्भ में खाई थी, क्योंकि यहाँ उसे दिल के मामले में काफी घाटा हुआ। इस प्रकार कहानी का शीर्षक तीसरी कसम भी सार्थक सिद्ध होता है।
प्रस्तुत कहानी में परिवेश अपनी पूर्ण समग्रता के साथ उभरकर आया है। उस अँचल के लोग, उनकी बोली, खान-पान, वहाँ का गीत-संगीत, मेला-नौटंकी अन्धविश्वास-कुरीतियाँ सब मिलकर अँचल विशेष को जीवन्त कर देते हैं। जिस स्थान, काल व समय को रचनाकार ने चित्रित करने का प्रयास किया है, वह स्थानीय रंग के कारण कहानी में उभरकर आया है। कहानी में हिरामन और हीराबाई जैसे मुख्य पात्रों के अतिरिक्त जो भी पात्र आए हैं वे अपनी पहचान बनाए बिना नहीं रह पाए हैं। पात्रों के संवाद और स्वगत कथनों के माध्यम से ही हम उनसे परिचित होते चलते हैं। इस प्रकार कह सकते हैं कि 'तीसरी पाँच दशक बाद भी पाठकों को उतना ही प्रभावित करती है जितना कि अपने कसम' कहानी फणीश्वरनाथ 'रेणु' की एक कालजयी रचना है। यह कहानी रचनाकाल में करती थी।
तीसरी कसम कहानी के महत्त्वपूर्ण तथ्य
- प्रसिद्ध कहानियाँ- 'मारे गए गुलफ़ाम' (तीसरी कसम), 'एक आदिम रात्रि की महक', 'लालपान की बेगम', 'पंचलाईट', 'तबे एकला चलो रे', 'ठेस', 'संवदिया'।
- 'तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफान' कहानी का प्रकाशन- 1956 ई. में हुआ था। यह कहानी 'ठुमरी' कहानी संग्रह में संकलित है।
- यह कहानी एक सीधे-सादे ग्रामीण युवक हिरामन और हीराबाई की भावनात्मक संवेदना की कहानी है।
- इस कहानी के 10 साल बाद 1966 ई. में, तीसरी कसम फिल्म रिलीज हुई। इस फिल्म के संवाद लेखन का काम 'रेणु' जी ने किया था। इसके डायरेक्टर 'बासु भट्टाचार्य' और निर्माता 'शैलेन्द्र' थे। इसके मुख्य रोल में 'राज कपूर' और 'वहीदा रहमान' थे।
- इस फिल्म को 1967 ई. का सर्वश्रेष्ठ हिन्दी फीचर फिल्म के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी मिला।
- इस कहानी के 10 साल बाद 1966 ई. में, तीसरी कसम फिल्म रिलीज हुई। इस फिल्म के संवाद लेखन का काम 'रेणु' जी ने किया था। इसके डायरेक्टर 'बासु भट्टाचार्य' और निर्माता 'शैलेन्द्र' थे। इसके मुख्य रोल में 'राज कपूर' और 'वहीदा रहमान' थे।
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तीसरी कसम कहानी के संदर्भ में आलोचकों के मत
1. गोपालराय के शब्दों में - "तीसरी कसम आँचलिक परिवेश में रचित चित्रात्मक कहानी है, जिसमे प्रेम की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है।”
2. निर्मल वर्मा के शब्दों में - "तीसरी कसम निश्छल प्रेम की मोहक कहानी है।"
Teesri Kasam Kahani MCQ
प्रश्न 01. 'तीसरी कसम' कहानी में चित्रित है।
ii. औराही हिंगना
iii. चेथरिया पीर
iv. सिरपुर बाजार
कूट -
- ii और iii
- i और ii
- i और iv
- iii और iv
उत्तर: 3. i और iv
प्रश्न 02. निम्नलिखित में से कौनसी कहानी 'ठुमरी' कहानी संग्रह में नहीं है?
- आदिम रात्रि की महक
- पंचलाइट
- तीसरी कसम
- रसप्रिया
उत्तर: 1. आदिम रात्रि की महक
प्रश्न 03. रेणु की कहानियों की प्रमुख विशेषता है।
- अस्तित्ववादी चिंतन
- भावात्मक त्रिकोण
- विस्थापन का दर्द
- ग्रामीण जीवन की सरसता
उत्तर: 4. ग्रामीण जीवन की सरसता
प्रश्न 04. 'तीसरी कसम' कहानी में गाड़ीवान ने कौनसा सामान न लादने की कसम नहीं खाई?
- कंपनी की औरत
- दुलहिन की डोली
- चोर बाजारी का सामान
- बाँस
उत्तर: 1. कंपनी की औरत
प्रश्न 05. निम्नलिखित में से कौनसा कहानी-संग्रह फणीश्वरनाथ रेणु का नहीं है?
- आदिम रात्रि की महक
- अग्निखोर
- अच्छे आदमी
- गरीबी हटाओ
उत्तर: 4. गरीबी हटाओ
प्रश्न 06. 'तीसरी कसम' फिल्म किस लेखक की कहानी पर बनाई गई थी?
- प्रेमचंद
- फणीश्वरनाथ रेणु
- चंद्रधर शर्मा गुलेरी
- जैनेन्द्र कुमार
उत्तर: 2. फणीश्वरनाथ रेणु
प्रश्न 07. 'तीसरी कसम' कहानी की मूल संवेदना संबंधित है -
- प्रेम की निष्कपट, रहस्यमयी एवं उदात्त अभिव्यक्ति से।
- एक नर्तकी के प्रेम की अपेक्षा धन को अधिक महत्त्व देने से।
- नायिका हीराबाई के अतृप्त प्रेम से।
- हिरामन के लोकोपकारी व्यक्तित्व से।
उत्तर: 1. प्रेम की निष्कपट, रहस्यमयी एवं उदात्त अभिव्यक्ति से।
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