लाल पान की बेगम कहानी - फणीश्वरनाथ रेणु

फणीश्वरनाथ 'रेणु' ने अपनी चर्चित कहानी लाल पान की बेगम से स्त्री सशक्तीकरण की मिसाल पेश की थी। इस कहानी के माध्यम से उन्होंने यह स्पष्ट करना चाहा है कि स्त्रियाँ भी अपने जीवन को अपनी शर्तों पर जीना चाहती हैं। वह आत्मसम्मान चाहती हैं। पर्दे की प्रथा हो या ऐसी कोई और प्रथा जो उन्हें गुलामों का जीवन जीने को विवश करती हो, वह उन्हें अब स्वीकार्य नहीं है। 

    फणीश्वरनाथ रेणु का जीवन परिचय 

    लेखक का नाम :- फणीश्वरनाथ रेणु (Phanishwar Nath Renu)

    जन्म :- 4 मार्च, 1921 (पूर्णिया ज़िला, बिहार)

    मृत्यु :- 11 अप्रैल, 1977

    पिता :- शिलानाथ 

    विषय :- कहानी, उपन्यास, रिपोर्ताज, संस्मरण, रेखाचित्र

    प्रमुख साहित्यिक कृतियाँ :-

    • उपन्यास - 
      1. मैला आंचल 
      2. परती परिकथा 
      3. जूलूस
      4. दीर्घतपा 
      5. कितने चौराहे 
      6. पलटू बाबू रोड 
    • रिपोर्ताज - 
      1. ऋणजल-धनजल
      2. नेपाली क्रांतिकथा
      3. वनतुलसी की गंध
      4. श्रुत अश्रुत पूर्वे
    • प्रसिद्ध कहानियाँ - 
      1. मारे गये गुलफाम (तीसरी कसम)
      2. एक आदिम रात्रि की महक
      3. लाल पान की बेगम
      4. पंचलाइट
      5. तबे एकला चलो रे
      6. ठेस
      • संवदिया

    सम्मान :-

    • मैला आंचल उपन्यास के लिये रेणु जी को पद्मश्री से सम्मानित किया गया।

    महत्‍वपूर्ण बिंदु :- 

    • 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन में उन्‍होंने सक्रिय रूप से योगदान  दिया।
    • रेणु जी को आजादी के बाद का प्रेमचन्द की संज्ञा दी जाती है।

    Lal Pan Ki Begum - Phanishwar Nath Renu

    लाल पान की बेगम कहानी का विषय

    • यह कहानी नारी सशक्तिकरण को केंद्र में रखकर लिखी गयी है।
    • नारी के स्वाभिमान और आत्मसम्मान का चित्रण 
    • गाँव में स्‍त्रीयों के बीच होने वाले मखौल का चित्रण किया गया है।
    • पति-पत्नी के रिश्तों के मध्य होने वाले खट्टी-मीठी नोंक-झोंक आदि का जीवांत चित्रण किया।
    • ग्रामीण परिवेश में और नाच का महत्व दिखाया गया है।
    • जिसे लेकर बड़े से बच्चों तक में कितना उत्साह होता है।

    लाल पान की बेगम कहानी के प्रमुख पात्र 

    बिरजू की माँ - कहानी की नायिका व एक सशक्त महिला है, जो समाज और परिवार में तारतम्य बनाते हुए सबको साथ लेकर चलने वाली दबंग नारी है। 

    बिरजू के पिता - कहानी में दब्बू इनसान के रूप में दिखते हैं, जो अपनी इच्छाओं को हमेशा दबाकर रखते हैं। 
    बिरजू, चम्पिया कहानी के बाल पात्र तथा भाई-बहन हैं, जो समय- समय पर कहानी के विकास में अपनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। 

    मखनी बुआ - गाँव की एक स्त्री पात्र है, जिसके आगे पीछे कोई नहीं है। 

    जंगी की पुतोहू - गाँव की एक नई बहू है, जो झगड़ालू प्रवृत्ति की स्त्री है। 

    सुनरी - गाँव की एक महिला पात्र है।

    'लाल पान की बेगम' कहानी की समीक्षा 

        'लाल पान की बेगम' कहानी में परम्परागत ढंग से कथा नहीं कही गई है, बल्कि बिरजू की माँ की मानसिक उथल-पुथल, कुछ पारिवारिक सन्दर्भों, क्रियाओं, आसपास की महिलाओं के व्यंग्यात्मक संवादों से आरम्भ में कथा निर्मित होती है और धीरे-धीरे बाहर-भीतर अपना विस्तार करती चलती है। एक छोटी-सी घटना के माध्यम से मानवीय व्यवहार की विभिन्न परतों को खोलना एवं दिखाना ही मानो कहानीकार का उद्देश्य रहा हो। कहानी की नायिका बिरजू की माँ एक सशक्त महिला है, जिसके कई सपने होते हैं, लालसा होती है। वह स्त्री सुलभ भावनाओं में जीती है। परिस्थिति अनुरूप उसकी मानसिकता में क्रमशः परिवर्तन होता जाता है। अपने मूल रूप में वह हृदय से बहुत ही सरल व सहज है, किन्तु प्रतिक्रियावादी है। 

    बिरजू की माँ को उसके पति ने गाड़ी पर मेला देखने जाने का वादा किया था। इसी यकीन पर कि पति दिया हुआ वादा पूरा करेगा, वह गली में सभी को मेला देखने जाने की बात बता देती है, परन्तु समय पर गाड़ी न मिल पाने से बिरजू के पिता को आने में देर हो जाती है। 

    वह (बिरजू के पिता) आएगा या नहीं, इसी दुविधा ग्रस्त मनःस्थिति में बिरजू की माँ झुंझलाती है तभी मखनी बुआ के यह पूछने पर कि "क्यों बिरजू की माँ, नाच देखने नहीं जाएगी क्या।" बिरजू की माँ जो पहले से ही मेले जाने के लिए पति के समय पर बैलगाड़ी न लेकर आने से नाराज बैठी थी, उसे मखनी बुआ का यह सवाल चुभ गया। मखनी बुआ ने सहजता से ही पूछा था, किन्तु गुस्से में उसने मखनी बुआ को ऐसा उत्तर दिया कि "तुम्हारे आगे पीछे कोई नहीं है, लेकिन मुझे सब देखना पड़ता है।" यह बात मखनी बुआ को चुभ गई। पानी भरते समय जब यह बात मखनी बुआ ने गाँव की औरतों को बताई तो पनिहारिनों ने बुआ को सांत्वना देने की कोशिश की।

    बातों-बातों में बात निकली कि बिरजू के पिता हाल में ही मजूर से स्वतन्त्र किसान हुए थे। ये सब चार पैसे आ जाने का ही नतीजा है कि बिरजू की माँ के पैर जमीन पर नहीं टिकते। जंगी की पुतोहू (बहू) ने इसी बीच बिरजू की माँ को लाल पान की बेगम कह दिया। इससे बिरजू की माँ की नाराजगी और अधिक बढ़ गई। नाराजगी और खुशियाँ कैसी क्षणिक हैं', ये दर्शाने में फणीश्वरनाथ 'रेणु' के समान कोई अन्य लेखक नहीं है। बिरजू के पिता को गाड़ी मिल जाती है। बिरजू की माँ बैलगाड़ी की आहट, बैलों की घण्टियाँ सुनकर खिल उठती है। भारतीय परिवेश में कोई अकेला नहीं होता, समाज परिवार का ही विस्तृत रूप होता है, अभी तक बिरजू की माँ जिनसे चिढ़ी बैठी थी उन सभी को गाड़ी में बिठा लेती है। 

    बिरजू की माँ ने बड़ी खुशी से मखनी बुआ को घर बुलाया। जंगी की पुतोहू और सुनरी को अपने साथ नाच देखने चलने के लिए गाड़ी पर बिठाया। रास्ते में खाने के लिए वह पहले ही अपने साथ कुछ सामान ले चुकी थी। साथ ही जंगी की पुतोहू, जिसने बिरजू की माँ को लाल पान की बेगम कहा था, उसके दिए सम्बोधन को अपना लिया गया। 

    बिरजू की माँ की झुंझलाहट और नाराजगी मन की अभिलाषा पूर्ण न हो पाने की आशंका से उत्पन्न निराशा का परिणाम थी। इसी निराशा ने उसमें 'न्यूनभाव' को जन्म दिया। अन्ततः उसके मन में बैर, कलह सबकुछ भुलाकर एक हो जाने की मूलभूत मानवीय प्रवृत्तियों का उदय होता है। 

    कहानीकार ने कहानी में यह दिखाने का प्रयास किया है कि मनचाही परिस्थिति न होने पर जो सारी बातें बिरजू की माँ को उद्विग्न (परेशान) बना रही थीं वहीं अनुकूल परिस्थिति होने पर उसे सहज व भली प्रतीत होने लगीं। जंगी की पुतोहू के जिस लाल पान की बेगम के सम्बोधन से वह बिफर गई थी, स्थिर चित्त में वही सम्बोधन उसे अनुकूल प्रतीत होने लगा। परिस्थिति व उनके मध्य मानवीय सम्बन्धों, भावों की जटिलता को यह शीर्षक दिखा पाने में समर्थ है व इसी में इसकी सार्थकता है।

    लाल पान की बेगम अतिमहत्त्वपूर्ण तथ्य 

    1. 1957 में भावात्मक शैली में लिखी गई 'लालपान की बेगम' एक आँचलिक कहानी है। 
    2. यह ठुमरी संग्रह में संकलित लालपान की बेगम 1956 की कहानी है। इलाहाबाद से प्रकाशित 'कहानी' पत्रिका के जनवरी 1957 के अंक में प्रकाशित हुई थी। 
    3. पुंज प्रकाश के द्वारा इस कहानी का नाट्य रूपान्तरण भी किया है, जिसे सन् 1907 में शारदा सिंह के निर्देशन में पटना के कालिदास रंगालय में मंचित किया गया। 
    4. यह कहानी नारी केन्द्रित कहानी है। इसे नारी सशक्तिकरण को केंद्र में रखकर लिखा गया है। 
    5. बेलगाड़ी पर बैठकर नाच देखने जाने के इर्द-गिर्द बुनी गई यह कहानी बिरजू की माँ के रूप में एक अलग व सशक्त स्त्री को पेश करती है। 
    6. कहानी में गाँव में महिलाओं के बीच होने वाले माहौल का जीवंत वर्णन किया गया है। 
    7. पति-पत्नी के बीच रिश्तों के खट्टी-मीठी, नोंक झोंक, और मनाना-रूठना आदि का वर्णन है। 

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    Laal paan ki bagum Kahani MCQ

    प्रश्‍न 01. फणीश्वरनाथ रेणु की 'तीसरी कसम' और 'लाल पान की बेगम कहानियाँ उनके किस संग्रह में संकलित हैं? 

    1. ठुमरी 
    2. आदिम रात्रि की महक 
    3. अग्निखोर 
    4. अच्छे आदमी

    उत्तर: 1. ठुमरी


    प्रश्‍न 02. रेणु द्वारा रचित 'लाल पान की बेगम' कहानी सर्वप्रथम किस पत्रिका में प्रकाशित हुई? 

    1. कहानी 
    2. साहित्य सुधानिधि 
    3. मर्यादा 
    4. सुदर्शन

    उत्तर: 1. कहानी


    प्रश्‍न 03. सर्वे के दौरान बिरजू के बप्पा को कितनी ज़मीन मिली ? 

    1. पाँच बीघा 
    2. दो बीघा 
    3. सात बीघा 
    4. तीन बीघा

    उत्तर: 1. पाँच बीघा 


    प्रश्‍न 04. बिरजू की माँ के प्रति ग्रामीण स्त्रियों की ईर्ष्या का क्या कारण था? 

    1. सम्पन्नता 
    2. बैलगाड़ी 
    3. पाँच बीघा ज़मीन 
    4. उन्नत व्यापार

    उत्तर: 3. पाँच बीघा ज़मीन


    प्रश्‍न 05. फणीश्वरनाथ रेणु के विषय में निम्नलिखित में से असंगत कथन है -

    1. रेणु ने प्रमुखतः कहानी, उपन्यास और रिपोर्ताज लिखे । 
    2. रेणु एक प्रगतिवादी उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्ध हैं।
    3. रेणु ने 1954 में 'मैला आँचल' उपन्यास से आँचलिक उपन्यास-लेखन की क्रमिक परंपरा का सूत्रपात किया।
    4. ऋणजल, धनजल उनका प्रमुख रिपोर्ताज-संग्रह है।

    उत्तर: 2. रेणु एक प्रगतिवादी उपन्यासकार के रूप में प्रसिद्ध हैं। 

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